कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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30 सित॰ 2026 · 2:05
इधर से देखें तो अपना मकान लगता है । शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी इधर से देखें तो अपना मकान लगता है इक और ज़ाविए से आसमान लगता है जो तुम हो पास तो कहता है मुझ को चीर के फेंक वो दिल जो…
29 सित॰ 2026 · 1:41
हवा जब आएगी | चंपा वैद हवा जल आएगी अकेली बैठा लूँगी अपने पास चले चलेंगे हम दोनों उस कविता के पर्वत पर उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार चश्मों से एकत्रित कर जल और सूरज के प्रबल प्रकाश…
28 सित॰ 2026 · 2:17
लहरों का गीत । सुमित्रानंदन पंत अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल! छू छू मृदु मलयानिल रह रह करता प्राणों को…
27 सित॰ 2026 · 2:10
तबला । विवेक निराला किसी की खाल है जो खींच कर मढ़ दी गई है मढ़ी हुई है मृतक की जीवन्त भाषा। मृतक के परिजनों का विलाप कस गया है इस खाल के साथ। वादक की फूँक से नहीं खाल के मालिक की…
26 सित॰ 2026 · 1:58
प्रेम समंदर। पल्लवी विनोद प्रेम समंदर-सा ही है धरती पर इतना कि सब डूब जाए इतना कि प्यास ही ना बुझे इतना कि डूबकर भी उतराता रहे निकल बाहर फिर इसी में समाता रहे प्रेम को पाना हो तो…
25 सित॰ 2026 · 1:46
बिलबिलाता सूर्य। वाज़दा खान डर और दबाव के घटाटोप अनधकार में बिलबिलाता सूर्य, कितना भीतर से जन्मा है सृष्टि के? भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी चढ़ नहीं पाया आकाश बन जाता आकाश…
24 सित॰ 2026 · 2:14
प्रेम के बारे में । सविता सिंह सिल्विया प्लाथ आओ मेरी आत्मा में बसो निश्चिंतता महसूस करो यहाँ अकेलापन कोई यातना नहीं जो ले जाए तुम्हें गैस स्टोव तक नहीं प्रेम के बदले नहीं मिला…
23 सित॰ 2026 · 2:49
तुमसे अलग होकर। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना तुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं है, न…
22 सित॰ 2026 · 1:36
गांव-देहात की बेटियां । नीरा परमार लू के थपेड़े हाड़ कंपाते जाड़े भरी बरसात में जंगल-पहाड़ नदी-नाले को लांघकर स्कूल जाती हैं दूर-दराज बियाबान में बसे गांव-देहात की बेटियां न तन…
21 सित॰ 2026 · 3:24
टेडी बियर में बचे हुए भालू। ज्ञानेन्द्रपति बच्चियाँ जब अपने टेडी बियर को छाती से चिपकाए दुलार रही होंगी छीज रहे भारतीय जंगलों में और खोजी दलों और अनुसंधान-स्टेशनों के कचरालय बने…
20 सित॰ 2026 · 1:22
बच्चा । इन्दु जैन औरत के सिर पर गठरी है कमर पर बच्चा मर्द हाथ में बक्सा लटकाये है बच्चा रो रहा है लगातार हाथ-पाँव पटक रहा बार-बार औरत के समझाने मर्द के झुँझलाने के बावजूद वह…
19 सित॰ 2026 · 1:45
कविताएँ । धर्मेश ख़त्म हो चुकी हैं कविताएँ शब्दों ने कर ली है सामूहिक आत्महत्या मजनूँ के क़त्ल हो जाने के डर से लैला ने तिलांजलि दे दी है अपने प्रेम की जंगल की हत्या पर आमादा शहर…
18 सित॰ 2026 · 2:11
अँगूठा छाप नेता । काका हाथरसी चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश। पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास? कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे। शामिल रहते हो या मात-पिता से…
17 सित॰ 2026 · 1:51
बिटिया मुर्मू के लिए | निर्मला पुतुल उठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठो उठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़ उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो जैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता है उठती…
16 सित॰ 2026 · 1:51
संतुलन के लिए । शायक आलोक वे जिस दुनिया में आए हैं वह है एक हँसती खिलखिलाती दुनिया। सब सुंदर है, लगे उन्हें इसलिए मैं मुस्कुरा देता हूँ नए बच्चों की तरफ़ आँखें मिचमिचा देता हूँ।…
15 सित॰ 2026 · 2:22
कोई मेरे साथ चले। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना मैंने कब कहा कोई मेरे साथ चले चाहा ज़रूर! अक्सर दरख्तों के लिये जूते सिलवा लाया और उनके पास खडा रहा वे अपनी हरीयाली अपने फूल फूल पर इतराते…
14 सित॰ 2026 · 2:21
अहा बुद्धिमानों की बस्ती । महेश अनघ अहा बुद्धिमानों की बस्ती या तो चुप्पी या तकरार - कोने-कोने भूत बियाने सारा घर सन्नाटेदार । सूचीबद्ध हुई दिनचर्या मज़बूरी रेखांकित है चौके से…
13 सित॰ 2026 · 2:11
माँ के लिए नहीं लिखी कविता । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ आज तक मैंने एक भी कविता माँ के लिए या उनके नाम पर नहीं लिखी लिखना भी चाहा तो नही लिख पाया बहुत कोशिश की हर भाषा हर बोली हर शब्द…
12 सित॰ 2026 · 1:28
सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ । जयप्रकाश मानस सिर्फ़ प्यार करती हैं तितलियाँ हाँ तितलियाँ फूलों से लता-वल्लरियों से अचीन्हे पराए मंजरियों से कहाँ परवाह कि झट झर जाएँगे पर नहीं…
11 सित॰ 2026 · 2:46
कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए । मोहम्मद अल्वी कुछ तो इस दिल को सज़ा दी जाए उस की तस्वीर हटा दी जाए ढूँडने में भी मज़ा आता है कोई शय रख के भुला दी जाए नाम लिख लिख के तिरा काग़ज़ पर…
10 सित॰ 2026 · 2:15
मसखरी । आशुतोष शर्मा गए रोज़ इक दोस्त को मिल गयी उसकी खोई हुई प्रेमिका मुझे उसकी खोई हुई हंसी को पा जाने की थी ख़ुशी लौट आने का सुख सबको नहीं मिलता, हँसी मिल जाती है और भी कई…
9 सित॰ 2026 · 2:03
जब मैं थका हुआ घर आऊँ । शकुन्त माथुर जब मैं थका हुआ घर आऊँ, तुम सुन्दर हो घर सुन्दर हो। चाहे दिन भर बहें पसीने कितने भी हों कपड़े सीने बच्चा भी रोता हो गीला आलू भी हो आधा छीला जब…
8 सित॰ 2026 · 1:35
आज मुझसे दूर दुनिया । हरिवंशराय बच्चन आज मुझसे दूर दुनिया! भावनाओं से विनिर्मित, कल्पनाओं से सुसज्जित, कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनिया! आज मुझसे दूर दुनिया! ‘बात पिछली…
7 सित॰ 2026 · 2:29
भ्रम । सुषमा कुमारी आसमान में अब बादल नहीं दिखता दिखता है बादल के होने का एक भ्रम पेड़ों पर अब चिड़ियाँ नहीं रहती रहता है उनके होने का एक भ्रम। फूर्लों पर अब मधुमक्खियाँ नहीं…
6 सित॰ 2026 · 2:30
मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ | नक़्श लायलपुरी मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत जानता हूँ तेरी…
5 सित॰ 2026 · 2:01
अकू | ख़ैरुल अनवर अनुवाद : जितेंद्र कुमार त्रिपाठी अगर मेरा अंतिम समय आ जाए तो मैं नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे दिलासा दे तुम भी नहीं मुझे उन आँसुओं की ज़रूरत नहीं मैं भेड़िया हूँ…
4 सित॰ 2026 · 1:32
बरसाती झोंका | धर्मवीर भारती चूमता आषाढ़ की पहली घटाओं को, झूमता आता मलय का एक झोंका सर्द; छेड़ता मन की मुँदी मासूम कलियों को और ख़ुशबू-सा बिखर जाता हृदय का दर्द!
3 सित॰ 2026 · 1:47
सभी पेड़ इक फूल हैं। अनुराग तिवारी सभी पेड़ इक फूल हैं जो प्रेम में दिए गए उपहार हैं। जिसे दिया होगा एक प्रेमिका के रूप में पृथ्वी ने हाथ बढ़ा कर अपने प्रेमी आकाश को! सभी नदियां…
2 सित॰ 2026 · 2:13
ऐसा भी हो सकता है | बल्ली सिंह चीमा साज़िश में वो ख़ुद शामिल हो, ऐसा भी हो सकता है, मरने वाला ही क़ातिल हो, ऐसा भी हो सकता है । आज तुम्हारी मंज़िल हूँ मैं, मेरी मंज़िल और कोई, कल…
1 सित॰ 2026 · 1:57
क्या वो दिन भी दिन हैं | राही मासूम रज़ा क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए क्या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए। हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे…
31 अग॰ 2026 · 1:59
आकाँक्षा । नंदकिशोर आचार्य एक अतीत रक्त की भाँति प्रवाहित रहता है मुझमें एक भविष्य ने साँसों की तरह बाँध रखा है मुझे और मैं - घड़ी को सुई - भविष्य के अतीत में बदलने की सूचना मात्र…
30 अग॰ 2026 · 2:05
तुम सुधि बन-बनकर बार-बार । भगवतीचरण वर्मा तुम सुधि बन-बनकर बार-बार क्यों कर जाती हो प्यार मुझे? फिर विस्मृति बन तन्मयता का दे जाती हो उपहार मुझे मैं करके पीड़ा को विलीन पीड़ा में…
29 अग॰ 2026 · 2:10
गहरी रात है । ज़ेब ग़ौरी गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत घर के दर-ओ-दीवार भी हैं कमज़ोर बहुत दर-ओ-दीवार: दरवाज़ा और दीवार तेरे सामने आते हुए घबराता हूँ लब पे तेरा इक़रार है दिल…
28 अग॰ 2026 · 2:00
तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है । फ़िराक़ गोरखपुरी तड़प कर जिगर मुँह को आ जाए है उसे देख कर कब रहा जाए है किसू ने न अब तक बताया हमें ग़म-ए-हिज्र में क्या किया जाए है मोहब्बत में ऐ…
27 अग॰ 2026 · 2:15
धत । कृष्णमोहन झा चाय-बिस्कुट-नमकीन धत चुटकुलों और निन्दाओं और नक़ली ठहाको धत होड़ लेती विनम्रताओं और खोखली सुंदरताओं धत राजनीतिक रूप से सही कविताओं और पुरस्कार के लिए लार टपकाती…
26 अग॰ 2026 · 2:30
ओ चिड़िया! । ऐश्वर्या तिवारी ओ चिड़िया आ बैठ खिड़की पे मैं मरीज़ इस दुनियादारी का देखा नहीं है आसमान का रंग अरसे से आ बैठ संग मेरे बता मुझे क्या रंग बटा है ऊपर-ऊपर? क्या इतनी ही…
25 अग॰ 2026 · 1:51
सीधी सी बात। पाब्लो नेरुदा (अनुवाद: मंगलेश डबराल) शक्ति होती है मौन (पेड़ कहते हैं मुझसे) और गहराई भी (कहती हैं जड़ें) और पवित्रता भी (कहता है अन्न) पेड़ ने कभी नहीं कहा: ‘मैं सबसे…
24 अग॰ 2026 · 1:38
दृश्य और बिम्ब। राजेश जोशी एक सिनेमा घर के सामने छूटी हुई जगह में एक नए मॉडल की चमचमाती कार एक विकलांग बच्चे को डरा रही है कार धीरे धीरे आगे सरक रही है और डरता, घबराता, गिरता…
23 अग॰ 2026 · 1:42
घ र । अरुण कुमार सिंह घर की याद में घर का स्पर्श है शब्दशः घ र घ र घ २ बुदबुदाते हुए शरीर का स्पर्श करता हूँ रेखाएं खोजती रहती हैं रास्ता घर का रेखाएं अंधी हैं घर नहीं दिखता आजकल…
22 अग॰ 2026 · 1:59
दस्तक । गुलज़ार सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं आँखों से मानूस थे सारे चेहरे सारे सुने सुनाए पाँव धोए, हाथ धुलाए आँगन में…
21 अग॰ 2026 · 3:01
श्राद्ध - आशुतोष शर्मा किसी चींटी को बचपन में कुचला था केंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता छत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को किसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या झूलों पे बन…
20 अग॰ 2026 · 1:50
एक ख्वाहिश । अमृता सिन्हा कभी कभी कुछ दूरियाँ अच्छी होती हैं, जैसे आँखों से काजल की दूरी कढ़ाही से करछी की दूरी लेखक की कलम से दूरी रचनाकार की रचनात्मकता से दूरी प्रेमी की प्रेम…
19 अग॰ 2026 · 2:03
विस्मय तरबूज की तरह । आलोकधन्वा तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा जब मैं उसके किनारों से वापस आया वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा वे जानवर जो…
18 अग॰ 2026 · 1:57
ईंधन । गुलज़ार छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे आँख लगाकर - कान बनाकर नाक सजाकर - पगड़ी वाला, टोपी वाला मेरा उपला - तेरा उपला - अपने-अपने…
17 अग॰ 2026 · 2:05
किताबें। तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ किताबें पढ़ा करों ये तार्किक बनाती हैं तुम्हें और बनाती हैं मार्मिक तुम्हारे विचारों को ताकि तुम अपने अधिकार को अपने कर्तव्य को समझ सको, परख सको…
16 अग॰ 2026 · 1:46
उपेक्षा । सुभद्राकुमारी चौहान इस तरह उपेक्षा मेरी, क्यों करते हो मतवाले! आशा के कितने अंकुर, मैंने हैं उर में पाले॥ विश्वास-वारि से उनको, मैंने है सींच बढ़ाए। निर्मल निकुंज में…
15 अग॰ 2026 · 1:45
मुझे तीन दो शब्द । अज्ञेय मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ। एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ, और दूसरा : जिसे कह सकूँ किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो। और तीसरा : खरा…
14 अग॰ 2026 · 1:23
गवाही। अदनान कफ़ील दरवेश क़ब्र में मेरी बगल में ही लिटाना मेरी कविता को भी जो मेरी दोस्त रही मेरे उन यातना के क्षणों में भी इस तरह हम एक साथ उठेंगे महशर के रोज़ शुभ दिन बोलते हुए…
13 अग॰ 2026 · 3:49
काशी मेरे काशी । ऐश्वर्या तिवारी मैं निरे शुन्य मैं बैठी वो जब आया था तो शुन्य हुए आया था हर बार कहता था - मैं कुछ नहीं, कोई नहीं मैं। हम मिलते बैठते कई घंटों फिर चले जाते, एक…
12 अग॰ 2026 · 2:11
परखना मत । बशीर बद्र परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं…
11 अग॰ 2026 · 2:10
कलम। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कलम उठाओ इसे इसमें छिपा है देवताओं-अप्सराओं का गान अबोध शिशुओं की मुस्कान यह भर सकती है फूलों में रंग पानी में आग और आग में थोड़ी-सी रोशनी फेंको इसे…
10 अग॰ 2026 · 2:35
नई नई आँखें हों तो । निदा फ़ाज़ली नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं जिस से अब तक…
9 अग॰ 2026 · 1:37
दुश्वारी । जावेद अख़्तर मैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ…
8 अग॰ 2026 · 2:19
हाय दैया । नीलेश रघुवंशी एक सुंदर ड्राइंगरूम के एक कोने में खड़ी है एक स्त्री मुस्कुराती-सी कजरारी आँखों के संग भौंह को टेढ़ा किए माथे पर लाल टीका उसके नीचे और ऊपर चार छोटी- छोटी…
7 अग॰ 2026 · 2:11
प्रेम का स्पर्श । रवींद्रनाथ टैगोर अनुवाद : हजारीप्रसाद द्विवेदी हे भुवन, मैंने जब तक तुम्हें प्यार नहीं किया था तब तक तुम्हारा प्रकाश खोज-खोजकर (भी) अपना सारा धन नहीं पा सका था!…
6 अग॰ 2026 · 3:20
अमीरी रेखा - कुमार अम्बुज मनुष्य होने की परंपरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ ऐसा होता आया है, बावजूद इसके कि कई चीज़ें इस बात…
5 अग॰ 2026 · 2:03
हम पंछी उन्मुक्त गगन के । शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे…
4 अग॰ 2026 · 2:27
माँ । पद्मा सचदेव बुलाने के लिए कई नाम हैं जिसे पुकारो बोलता भी है पर एक नाम ऐसा है जिसे पुकारो तो सब चौकन्ने हो जाते हैं सभी सोचते हैं ये नाम मेरे लिए तो नहीं माँ... माँ...…
3 अग॰ 2026 · 2:45
दोनों ओर प्रेम पलता है। मैथिलीशरण गुप्त दोनों ओर प्रेम पलता है। सखि, पतंग भी जलता है हां! दीपक भी जलता है। सीस हिलाकर दीपक कहता - ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’ पर पतंग पड़ कर ही…
2 अग॰ 2026 · 1:36
लिपि । हेमंत देवलेकर उन्होंने कहा -" लिखो" मैं मोबाइल पर टाइप करने लगा यह देख वे भड़क उठे -"हमने कहा, लिखो" मेरी याददाश्त पर गहरी चोट पड़ी और मोबाइल हाथ से गिर गया वे पूर्वज थे…
1 अग॰ 2026 · 1:42
बरसात मुबारक हो। मीना कुमारी नाज़ बरसात मुबारक हो ये साथ मुबारक हो हर दिन रहे सलोना हर रात मुबारक हो सँवलाई हुई शामों को हर सुब्ह मुबारक हो हिचकी हो या सिसकी हो हर नग़्मा मुबारक…
31 जुल॰ 2026 · 2:28
कुछ सच्चाईयां, कुछ झूठ । वाज़दा खान केवल मिसाइलें ही गहरे मारक असर नहीं करतीं जीवन में और भी बहुत कुछ है गहरा और असरदार कभी उतरो जो उन गहराइयों में जहां बेहद अन्धेरा है कहीं है…
30 जुल॰ 2026 · 1:54
मुस्टंडा और बच्चा। शुभा भाषा के अंदर बहुत सी बातें सबने मिलकर बनाई होती हैं इसलिए भाषा बहुत समय एक विश्वास की तरह चलती है जैसे हम अगर कहें बच्चा तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा लेकिन…
29 जुल॰ 2026 · 2:19
पुकारे जा रहे हो अजनबी से । ज़फ़र गोरखपुरी पुकारे जा रहे हो अजनबी से चाहते क्या हो ख़ुद अपने शोर में गुम आदमी से चाहते क्या हो ये आँखों में जो कुछ हैरत है क्या वो भी तुम्हें दे दें…
28 जुल॰ 2026 · 1:28
बिन घरनी घर भूत का डेरा । आभा बोधिसत्व हज़ारों ग्रहों में यह धरती बहुत छोटी-सी है, हज़ारों घरों में बहुत छोटा है तुम्हारा घर तुम्हारा छोटा-सा घर था, ढेर सारे छोटे-छोटे समानों से…
27 जुल॰ 2026 · 2:20
कहते हैं, तारे गाते हैं! । हरिवंश राय बच्चन कहते हैं, तारे गाते हैं! सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमने कान लगाया, फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं! कहते हैं,…
26 जुल॰ 2026 · 2:00
अंतिम सिपाही की तरह । लीलाधर मंडलोई मैं उनके लिए पागल हूँ जिन्हें बचा नहीं सका मैं उनके लिए रोता हूँ जो लड़ते हुए क़ब्र में अब भी ज़िंदा हैं मैं रस्मी मातम में शरीक़ नहीं मैं उन…
25 जुल॰ 2026 · 1:51
हर बार दीवार। ज्योत्स्ना मिलन आसमान होगा की उम्मीद में बाहर देखती खिड़की से बाहर दीवार होती सामने और होती फाँक भर धूप दो दीवारों के बीच धरी-सी दीवार की जगह आसमान नहीं निकला कभी…
24 जुल॰ 2026 · 2:54
मैं ढूँडता हूँ जिसे । कैफ़ी आज़मी मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता वो तेग़ मिल…
23 जुल॰ 2026 · 2:06
मुझ को तेरा शबाब ले बैठा। शिव कुमार बटालवी अनुवाद: आकाश 'अर्श' मुझ को तेरा शबाब ले बैठा रंग, गोरा गुलाब ले बैठा दिल का डर था कहीं न ले बैठे ले ही बैठा जनाब ले बैठा जब भी फ़ुर्सत…
22 जुल॰ 2026 · 1:40
जन्मदिन । बेबी शॉ तुम्हें सोचते हुए रोज़ एक नई दुनिया रचती हूँ मिट्टी के चावल धूल की सब्ज़ी पत्ते की रोटी खेल-घर जैसी... एक ऐसी दुनिया जिसे कोई नहीं जानता जहाँ प्रकाश-लोभ से…
21 जुल॰ 2026 · 2:10
अपनी यातना में । सविता सिंह वह सो चुकी थी कई नींदें कई दिन और रातें बीत चुकी थीं कई ज़िंदगियाँ बन और बिखर चुकी थीं इस बीच लेकिन एक सपना था जो अब भी झिलमिला रहा था जिसकी झालर को…
20 जुल॰ 2026 · 1:20
विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद ...मैं हूँ मैं हूँ किसी का ...हूँ किसी का सपना देखा हुआ अनदेखा अपना स्मृति में जैसे बसा-किसी की विस्मृति का फूल बन, खिलने की हसरत में दिन-रात तपना…
19 जुल॰ 2026 · 2:03
रोने वाला ही गाता है । गोपालदास नीरज रोने वाला ही गाता है! मधु-विष हैं दोनों जीवन में दोनों मिलते जीवन-क्रम में पर विष पाने पर पहले मधु-मूल्य अरे, कुछ बढ़ जाता है। रोने वाला ही…
18 जुल॰ 2026 · 2:19
कर्बला। राजेश जोशी पानी पियो तो याद करो प्यास इमाम हुसैन की! पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो बादलों का नदियों, तालाबों और समुंदरों का शुक्रिया अदा करो समुंदरों का समुद्रों का पानी…
17 जुल॰ 2026 · 4:27
झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन । ज्ञानेन्द्रपति डबडबा आया है भुरुकवा पूरब में भिनसार का भान है चिड़ियों का उजला कलरव जागने से पहले अँधियारी में एक काली कराह की मद्धिम गूँज है वह…
16 जुल॰ 2026 · 1:57
फिर काहे की दूरियाँ । अनवर सुहैल देखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी की मिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ ग़ज़लों की तुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज़्यादा आ जाती और…
15 जुल॰ 2026 · 1:31
मिट्टी की काया । विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी में बहती है मंदाकिनी अलकनंदा इसी में चमकते हैं कैलाश नील्कंठ इसी में लिखते हैं ब्रह्मकमल इसी में फड़फड़ाते हैं मानसर के हंस मिट्टी की…
14 जुल॰ 2026 · 1:52
तोप । वीरेन डंगवाल कंपनी बाग़ के मुहाने पर घर रखी गई है यह 1857 की तोप इसकी होती है बड़ी सम्हाल, विरासत में मिले कंपनी बाग़ की तरह साल में चमकाई जाती है दो बार सुबह-शाम कंपनी…
13 जुल॰ 2026 · 1:48
ज़रा-ज़रा-सा। सुनीता जैन जी में जी खुलता है ज़रा-ज़रा-सा फागुन ऋतु का बौर हवा घुलता है ज़रा-ज़रा-सा गेरू रंग मधुमाखी है रंग पीला ततै - य्या ज़हरीला तितली के तो रंग गिनूँ क्या हर…
12 जुल॰ 2026 · 1:33
यही है सादगी । पाब्लो नेरूदा अनुवाद - प्रभाती नौटियाल ख़ामोश है ताक़त (पेड़ बताते हैं मुझे) और गहराई (बताती हैं जड़ें) और शुद्धता (बताता है आटा) किसी पेड़ ने नहीं कहा मुझसे ”मैं…
11 जुल॰ 2026 · 3:44
अभिधा की एक शाम। विवेक निराला एक छोटी शाम जो लम्बी खिंचती जाती थी बिल्कुल अभिधा में। रक्ताभा लिए रवि लुकता जाता था। लक्षणा के लद चुके दिनों के बाद अभिधा की एक छोटी-सी शाम…
10 जुल॰ 2026 · 2:51
प्रक्रिया । केदारनाथ सिंह मैं जब हवा की तरह दृश्यों के बीच से गुज़रता हुआ अकेला होता हूँ तो क्षण भर के लिए मुझे कहीं भी देखा जा सकता है किसी भी दिशा से किसी भी मोड़ पर किसी भी…
9 जुल॰ 2026 · 2:15
विस्मृति। सुषमा कुमारी हम दूसरी दुनिया के चौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे के बचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं, आधे गेहूँ और आधे घून की तरह बची हुई हमारी नियति जातें में पीसने को तैयार…
8 जुल॰ 2026 · 2:21
सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ। भारत भूषण सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ प्रिय मिलने का वचन भरो तो! पलकों-पलकों शूल बुहारूँ अँसुअन सींचू सौरभ गलियाँ भँवरों पर पहरा बिठला दूँ कहीं न जूठी…
7 जुल॰ 2026 · 3:48
ओ अच्छी लड़कियों | प्रतिभा कटियार ओ अच्छी लड़कियो, तुम मुस्कुराहटों में सहेज देती हो दुःख ओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनर जब बोलना चाहती हो दिल से तो बाँध लेती हो बतकही की पाजेब…
6 जुल॰ 2026 · 1:51
औरतें काम करती हैं । शुभा चित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों की दुनिया के बाहर मालिकों की दुनिया के बाहर पिताओं की दुनिया के बाहर औरतें बहुत से काम करती हैं वे बच्चे को बैल…
5 जुल॰ 2026 · 2:00
लौटते नहीं पिता । कुमार दिव्यनशु शेखर नीम-अँधेरे घर से निकले पिता अँधेरे से पहले लौट आने की बात दोहरा के। लौटी एक ख़बर लौटा एक एम्बुलेस। नीम-अँधेरे निकले पिता फिर नहीं लौटे।…
4 जुल॰ 2026 · 2:47
हलचल। अनुराग तिवारी तेज़ कुछ भी हो सकता है किंतु सबसे तेज़ क्या है चीते की चाल बाज़ की नज़र नहीं। सबसे तेज़ हलचल होती है जैसे आज एक हलचल हुई, मेरी आहट से दीवार पर चिपकी छिपकली…
3 जुल॰ 2026 · 3:01
बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर । अरुण कुमार सिंह तुम जागती करवटों से लिखते हो कोई नाम सुबह चादर बूँद-बूँद निचोड़ती है अपनी पीड़ा बहेलिए ने मारा फिर कैद की एक चिड़िया जिसके पेट में…
2 जुल॰ 2026 · 1:53
छतों पर लड़कियाँ । आलोक धन्वा अब भी छतों पर आती हैं लड़कियाँ मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ। गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं…
1 जुल॰ 2026 · 2:00
हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए। कुंवर बेचैन हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए एक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जाएँगे धीरे धीरे ही सही राह पे…
30 जून 2026 · 1:33
स्त्री की नींद। नीलेश रघुवंशी एक छोटे से डाकखाने में वो स्त्री अपनी सीट पर इतनी उदास इतनी अकेली समय उसके आसपास नहीं होता ऊँघते और झपकियाँ लेते एक ही गलती को दोहराती है बार-बार…
29 जून 2026 · 2:33
परंतु । कुमार अम्बुज बुद्धिजीवी भी सड़क पर आ सकते हैं परंतु क्या करें यह सरकार ठीक नहीं है माना कि यह लोकतंत्र है और हम सुधारना चाहते हैं यह समाज परंतु इधर ठाकुरों के वोट बहुत हैं…
28 जून 2026 · 1:44
किताब के फूल । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ जब भी अपने प्रेमिका को देना गुलाब देना संग किताबें भी ताकी उन किताबों में उस गुलाब को संजो सके तुम्हारे दिए खतों को उस किताब के पन्नों में छुपा…
27 जून 2026 · 2:11
स्वरों का समर्पण । श्रीकांत वर्मा डबडब अँधेरे में, समय की नदी में अपने-अपने दिये सिरा दो; शायद कोई दिया क्षितिज तक जा, सूरज बन जाए!! हरसिंगार जैसे यदि चुए कहीं तारे, अगर कहीं शीश…
26 जून 2026 · 1:18
दीवार । साक़ी फ़ारुक़ी रगों में नाच रहा है इक आतिशीं ज़हराब आतिशीं: अग्निमय ज़हराब: ज़हरीला पानी तिरी तलाश फ़क़त जिस्म का तक़ाज़ा है तिरी तलब के जहन्नम में जल रहा है बदन तलब: तलाश…
25 जून 2026 · 1:14
इच्छाएँ । आस्तीक वाजपेयी लकड़ी की अलमारी पर धूल, उनसे चिपकी दीवार पर टँगी इच्छाएँ। जैसे मैं अलमारी को, वैसे पूरी न हुई इच्छाएँ मुझे, झाड़ने आती हैं।
24 जून 2026 · 2:00
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें । शहरयार ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें सुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहें दिन…
23 जून 2026 · 1:33
मिलन । भारतभूषण अग्रवाल छलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान, मुस्कुरा पाया न ओठों पर प्रणय का गान; ज्यों जुड़ीं आँखें, मुड़ीं तुम, चल पड़ा मैं मूक - इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये…
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