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Pratidin Ek Kavita

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Vismay Tarbooz Ki Tarah | Alok Dhanwa

Pratidin Ek Kavita · 19 अग॰ 2026 · 2:03

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विस्मय तरबूज की तरह ।  आलोकधन्वा


तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा

जब मैं उसके किनारों से वापस आया


वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं

जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा


वे जानवर

जो सुदूर धूप में मेरे साथ खेलते थे


और उन्हें इंतज़ार करना नहीं आता था

और वे पहले छाते


बादल जिनसे बहुत क़रीब थे

समुद्र मुझे ले चला उस दुपहर में


जब पुकारना भी नहीं आता था

जब रोना ही पुकारना था


जहाँ विस्मय

तरबूज़ की तरह


जितना हरा उतना ही लाल।

एपिसोड: Pratidin Ek Kavita

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