Pratidin Ek Kavita · 17 जुल॰ 2026 · 4:27
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झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन । ज्ञानेन्द्रपति
डबडबा आया है भुरुकवा
पूरब में भिनसार का भान है
चिड़ियों का उजला कलरव जागने से पहले
अँधियारी में एक काली कराह की मद्धिम गूँज है
वह कौन है
इस नीरव झारखण्ड में
अपने कलपने को
अपने भी कानों से दूर
हिरदै की मुट्ठी में कसे हुए?
वे छोटानागपुर के ठिगने पहाड़ हैं
यहाँ के काले दुबले हड़ियल बूढ़े
आदिवासियों की तरह ही चुप्पा कठिन
नए दिन के लिए वे तैयार कर रहे हैं ख़ुद को
अब आएँगे पर्वतों के पंख काटने वाले वज्रधर इन्द्र के वंशज
अपनी फटफटिया में भड़भड़िया में
और फटाफट धड़ाधड़
चालू हो जाएँगे क्रशर
बारूद की गन्ध फैल जाएगी हवा में
उनके टूटने की गन्ध के ऊपर
और वे बोल्डरों में गिट्ठियों में खण्ड-खण्ड हो जाएँगे
चौड़े पंजरों वाले ट्रकों के पेट
टायरों की हवा तक भरते जाएँगे जल्दी-जल्दी
और धीरे-धीरे चमक बढ़ती जाएगी
उन चेहरों पर
जिनकी जेब में उन्हें तोड़ने का पट्टा है
यानी एक मुहर लगा बेमतलब-सा पर मतलबी कागज़
और ख़ुश जो मन ही मन कहेंगे
आज ठर्रा नहीं, विलायती चलेगी
एक नया दिन
कि पुराना दिन
है इन प्राचीन पहाड़ों के सामने
तेज़ हवाओं में जिनकी ठोस काया में भीतर ही भीतर
अभी भी बज उठता है मैग्मा-धरती का वह मूल द्रव्य-जलतरंग-सा
जिनकी आग्नेय चट्टानें
धरती की प्राचीनतम रचनाएँ हैं
हिमालय के पर्वत-वलय जिनके बच्चे-बुतरू
धुँधली आँखें उठाए नेह से निहारते हैं वे।
भुकम्प-तरंगें छोड़ती एड़ियाँ उचका नभ में उठते
हिमालय के वर्फीले-गर्वीले शिखरों के युवमाथ
सत्तर करोड़ वर्षों का समय पसरा हुआ है
उनकी काली घिसी हुई देह में
वे पर्वतकुल के आदि पुरुष हैं
बस सात करोड़ वर्ष हुए हैं, इनके कुल-खुँट में
उगी थी हिमालय की कोंपल
विन्ध्याचल तब नाच-नाच उठा था मगन
अरावली पर्वत-मालाओं ने गाए थे सोहर
आशीष दिया था इन पठारों से
आदिपर्वतों ने
ये वही पुरखे पहाड़ हैं जिनके हाड़
आज लालची मानव-गिद्धों का भोजन-भर
पूरब में
डबडबा आया है भुरुकवा
कि जैसे वह छोटानागपुर के छीजते जंगलों, मिटती वनस्पतियों, खंखुरते खनिजों की
आँख हो
कि क्या धरा है भू में
इन भूधरों की छाँह के गुज़र जाने के बाद
बस आतप और बिपत ।