Pratidin Ek Kavita · 16 जुल॰ 2026 · 1:57
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फिर काहे की दूरियाँ । अनवर सुहैल
देखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी की
मिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ ग़ज़लों की
तुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज़्यादा आ जाती
और अपने उर्दू ज्ञान से प्रभावित करने के लिए
कहते मुझे जनाब की जगह ‘ख़ुदा-हाफ़िज़’
जबकि मैं तुम्हारी तरह इसी मिट्टी की उपज हूँ
उतना ही हिंदी, उतना ही देसी, उतना ही देहाती जितने तुम
फिर मुझे क्यों देखते हो एक परदेसी की तरह
मैं कोई एलियन नहीं हूँ भाई
खान-पान, बरत-त्यौहार, रीत-रिवाज अलग होते हुए भी
कितने एक से हैं...देखो न,
बेटियाँ बिदा के वक़्त रोती हैं तुम्हारे यहाँ
और भर आती हैं आँखें लड़के वालों की भी
हमारे यहाँ भी तो ऐसा ही होता है भाई
फिर काहे का अंतर...
फिर काहे की दूरियाँ...