Pratidin Ek Kavita · 25 जुल॰ 2026 · 1:51
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हर बार दीवार। ज्योत्स्ना मिलन
आसमान होगा की उम्मीद में
बाहर देखती खिड़की से
बाहर
दीवार होती सामने
और होती
फाँक भर धूप
दो दीवारों के बीच धरी-सी
दीवार की जगह
आसमान नहीं निकला कभी
घास का मैदान भी नहीं
खिड़की के बाहर
हर बार
एक दीवार
आसमान के बदले।