Pratidin Ek Kavita · 8 अग॰ 2026 · 2:19
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हाय दैया । नीलेश रघुवंशी
एक सुंदर ड्राइंगरूम के एक कोने में खड़ी है एक स्त्री मुस्कुराती-सी
कजरारी आँखों के संग भौंह को टेढ़ा किए
माथे पर लाल टीका उसके नीचे और ऊपर चार छोटी- छोटी बिंदी
ओंठों पर लाली ठोड़ी पर सात टिकुली
काली धोती के संग चटक हरे रंग का पोलका
हाथ में गिलट के कड़े और बाजुबंद
गले में हँसली बजट्टी माथे पर गिलट की बेड़ी लगाए
कमर में करधौनी और पाँव में आयलें संग में आँवड़ा कड़ा भी
स्त्री के सिर पर टोकरी
टोकरी में फल हैं चमकदार और रंगीन
सचमुच की फल बेचने वाली
अगर इसे देख ले तो हँसेगी कितना
हाय दैया हाय दैया करते हो जाएगी लोट-पोट
अगर फलों की टोकरी लिए खड़ी हो जाए कोने में
तो क्या लगेगी वह भी इतनी लुभावनी और इतनी ही सुंदर
धत्-
झटक देगी सर को और कहेगी इसको बनाने वाले की मति फिर गई है
चौराहे पर मुझ जैसी कई हर दिन सिर पर टोकरी लिए बेचती हैं फल
जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को
भरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते
आग लगे ससुरों की हँसी ठिठोली को
मूँछोंबारों की मूँछें बर जाएँ हमीं को सजा लिए अपने घर में
हाय दैया..