Pratidin Ek Kavita · 13 जुल॰ 2026 · 1:48
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ज़रा-ज़रा-सा। सुनीता जैन
जी में जी खुलता है
ज़रा-ज़रा-सा
फागुन ऋतु का बौर
हवा घुलता है
ज़रा-ज़रा-सा
गेरू रंग मधुमाखी है
रंग पीला ततै -
य्या ज़हरीला
तितली के तो रंग गिनूँ क्या
हर रंग ही चट -
कीला
अंतस में ज्वार उमड़ता
कहाँ कहाँ का
ज़रा-ज़रा-सा