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नवरात्रि का दूसरा दिन है। पंडालों की चहल-पहल और मिठाइयों की खुशबू के बीच, आरू और ऋषि फिर से पहुँचते हैं काका बाबू के पास, जहाँ शुरू होती है माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप माँब्रह्मचारिणी की कथा।
देवी पार्वती का वह रूप, जिसने भगवान शिव को पाने के लिए कठिन तपस्या की, हज़ारों सालों तक केवल फल, पत्ते, और अंत में सिर्फ वायु और चंद्रकिरणों पर जीवित रहकर। तीन हज़ार वर्षों तक चली इस कठोर साधना ने उन्हें “ब्रह्मचारिणी” नाम दिया। हाथों में जपमाला और कमंडल लिए, माँ ब्रह्मचारिणी संयम, भक्ति और दृढ़ निश्चय का प्रतीक हैं। उनकी पूजा से मिलता है आत्मबल, धैर्य और जीवन की हर कठिनाई को सहने की शक्ति।
तो जानिए कैसे माँ ब्रह्मचारिणी की तपस्या ने देवताओं को भी चकित कर दिया, और क्यों नवरात्रि का दूसरा दिन पूरी तरह उन्हें समर्पित है।