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नवरात्रि के सातवें दिन पूजी जाती हैं माँ कालरात्रि, जो अज्ञान और भय के अंधकार को मिटाकर प्रकाश लाने वाली शक्ति हैं।
उनका स्वरूप भले ही देखकर भयानक लगे, लेकिन वे अपने भक्तों को निर्भय और सुरक्षित रखने वाली करुणामयी माँ हैं। उनके दो हाथों में वज्र और खड्ग होते हैं, और शेष हाथों से वे वरदान और अभय देती हैं। उनकी कहानी जुड़ी है असुर रक्तबीज से, जिसे ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसकी रक्त की हर बूँद से एक नया रक्तबीज राक्षस जन्म ले लेता। कोई भी उसे पराजित नहीं कर पा रहा था।
तब माता पार्वती ने अपना कालरात्रि रूप धारण किया। युद्धभूमि में उतरते ही उन्होंने गर्जन से राक्षसों को भयभीत कर दिया। जब भी रक्तबीज घायल हुआ, माँ ने अपनी जीभ से उसके रक्त की हर बूँद को पी लिया, ताकि नया राक्षस जन्म ही न ले सके। अंततः रक्तबीज का वध हुआ और अधर्म का नाश हो गया।
माँ कालरात्रि का यह रूप हमें सिखाता है कि सबसे गहरा अंधकार भी ज्ञान और शक्ति के प्रकाश से समाप्त हो सकता है। सप्तमी के दिन उनकी पूजा से साधक का मन सहस्त्रार चक्र तक पहुँचता है, जहाँ से उसे निर्भयता, सिद्धियाँ और दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है।
तो जानिए कैसे माँ कालरात्रि ने रक्तबीज का अंत कर देवताओं को विजय दिलाई।