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Pratidin Ek Kavita

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Chandini | Ramvilas Sharma

Pratidin Ek Kavita · 10 अक्टू॰ 2026 · 2:27

0:002:27

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चाँदनी । रामविलास शर्मा


चाँदी की झीनी चादर-सी

फैली है वन पर चाँदनी।


चाँदी का झूठा पानी है

यह माह-पूस की चाँदनी।


खेतों पर ओस-भरा कुहरा,

कुहरे पर भीगी चाँदनी;


आँखों में बादल-से आँसू,

हँसती है उन पर चाँदनी।


दु:ख की दनिया पर बुनती है

माया के सपने चाँदनी।


मीठी मुस्कान बिछाती है

भीगी पलकों पर चाँदनी।


लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख,

सपनों-सी झूठी चाँदनी;


लोहे से दु:ख को काटे क्या

सपनों-सी मीठी चाँदनी।


यह चाँद चुरा कर लाया है

सूरज से अपनी चाँदनी।


सूरज निकला, अब चाँद कहाँ?

छिप गई लाज से चाँदनी।


दु:ख और कर्म का यह जीवन,

वह चार दिनों की चाँदनी।


यह कर्म-सूर्य की ज्योति अमर,

वह अंधकार की चाँदनी।


एपिसोड: Pratidin Ek Kavita

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